Saturday, January 12, 2008

गालियाँ मजेदार होतीं हैं??

गालियाँ अक्सर मजेदार ही होती हैं॥ देने वाले को और उससे कहीं ज्यादा उन तमाम सुनाने वालों को जिन्हें लक्ष्य करकर गालियाँ नही दी गयीं होतीं। सबसे अच्छी बात तब होती हैं जब गालियों को लक्ष्यहीन बना कर दी जाये। आपके मन मे जब भी कुंठा आये या कभी किसी बात पर चिढ आये हम २ -४ गालियाँ देकर तनावमुक्त महसूस करते हैं। व्यापार मे नुकसान होने पर या ऑफिस मे बॉस की झिड़की खाने के बाद घर आकर नौकर या कहे तो अपनी पत्नी को गलियां देने के बाद मन जितना तनावमुक्त होता हैं उसकी बराबरी अन्य तरीके से नही की जा सकती॥
गालियों की उपरोक्त खासियत तो तब हैं जब गालियाँ खाने वाले के दुखी होने के कीमत पर हम तनावमुक्त होते हैं। दूसरी स्थिति मे हम गालियों के श्रोता तो होते हैं, लेकिन गालियाँ हमे लक्ष्य करके नही दी जाती। मसलन मोहल्ले मे चल रही पति-पत्नी के बीच मे गाली-गलौज॥ कुछ्लोगो का यह काम ही दुसरे लोगों को लड़वाना होता हैं जिससे कि उन्हें कुछ गालियाँ सुनने को मिल जाएँ।
इन सब से बिपरीत कभी कभी गालियाँ खाने का भी १ अलग ही मज़ा होता हैं। जैसे कि गांवों मे युवाओं का मुख्य मनोरंजन ब्रिद्ध लोगों की गालियाँ सुनकर होता हैं। बारातियों को अगर ढंग से गालियाँ न पड़े तो १ शिक़ायत सी बनी रहती हैं।
पर उनका क्या जिन्हें लक्ष्य करके गालियाँ दी जाती हैं? शायद वे लोग भी अपनी कुंठा या चिढ किसी अन्य को गालियाँ देकर निकल लेते हों। भारतीय जातीय समाज बहुत ही ईमानदारी से सबको शोषण करने का मौका देता हैं। बड़ी ही आसानी से उच्च वर्ण निम्न जातियों को और निम्न वर्ण अपने से निम्न वर्ण के जातियों को गाली देकर कुंठा मुक्त हो सकते हैं॥ स्त्रियों का भी इस कुंठा मुक्त समाज के निर्वाण मे महत्ती भूमिका हैं। सद्जनो की पीडा इस बात से कम हो सकती हैं कि आज तक ढोल, गंवार, क्षुद्र, पशु, नारी गालियाँ खाकर भी समाज का नींव बने हुए हैं॥

11 comments:

अरबिंद said...

bahut accha prayas, kuchh bhopaliaon ko isme shamil karen, pahunche hue gaaliwaz hote hain, adhiktar theth bhopali bhenkade aur maakade ke bina baat hi shuru nahin karte. yahan aap ko bata doon ki bhenkade- bahen ke lavade ka shortform hai aur maakade- maa ke lavde ka. In dono gali ki utpatti par kuchh prakash dalen.

vaise mujhe lagta hai ki gaali, kuntha ki bajay domination ya aggression ke expression ka jaria hai aur sharirik hinsa se pahle aata he isliye ese shabd hinsa kaha ja sakta hai.

mere gyan ke anusar gaaliyon par kafi kam research hui hai, aapa blog is kami ko poora karega aisi ummeed hai

भुवनेश शर्मा said...

बहुत बढि़या ब्‍लाग.

इन विषयों में तो हम भी रुचि रखते हैं. लगे रहिए.

कम से कम कोई तो बात कर रहा है उस बात पर जो हमारे जीवन का हिस्‍सा है पर हम हमेशा ही खुद को उससे अलग रखना चाहते हैं.

कमल शर्मा said...

आपका ब्‍लॉग देखा, अच्‍छा है। कई लोगों को गालियां विषय पर बात करने से परहेज हो सकता है या सार्वजनिक तौर पर गालियों को लेकर बात नहीं करना चाहते हो, लेकिन मेरा मानना है कि गालियां हर व्‍यक्ति अपने जीवन में बोलता है और सुनता भी है। रुप अलग अलग हो सकते हैं। हालांकि मैं मानता हूं कि अंग्रेजी में बोली गई गालियों में वह दम नहीं होता जो हिंदी या लोकल भाषा में बोली जाती है। अंग्रेजी में तो कुछ ही गालियां है जो आम हिंदुस्‍तानी यूज करता है लेकिन हिंदी में दमदार गालियों की कमी नहीं है। बंधु आपका ब्‍लॉग दीर्घायु हो यही कामना है। उम्‍मीद है आप समय समय पर हर गाली की परिभाषा और लुप्‍त हुई गालियों से परिचय कराते रहेंगे। राजस्‍थान के जयपुर जिले में एक कस्‍बा है सांभर झील, जहां होली से पहले सात आठ दिन पहले से पर्व चालू हो जाता है और जहां छोटा बाजार एवं बड़ा बाजार के लोग इन बाजारों की सीमा पर एकत्र होकर गालियां गीतों के रुप में बोलते हैं जो सीधे होली से जुड़े होते हैं। हालांकि, सांभर गए मुझे अब तकरीबन 20साल हो गए इसलिए नहीं पता कि वहां की नई पीढी इसे मनाती है या नहीं। हर बोली और हर भाषा में गालियों का महत्‍व है। जो लोग इसे बुरा मानते हैं वह उचित नहीं। यह वैचारिक मतभेद का विषय हो सकता है। उम्‍मीद है हमें अपने देश और विदेश की विभिन्‍न नई, पुरानी गालियों से अवगत होने का मौका आपके ब्‍लाग पर मिलेगा। मैं यहां एक अखबार में काम कर रहा था तो वहां मार्केटिंग में एक सज्‍जन थे श्‍याम सुर्वे उन्‍हें एक टैक्‍सी ने टक्‍कर मार दी तो जो गाली उन्‍होंने बोली उसे सुनिए....बिल्‍कुल अदभुत....तेरी बीबी के भोसड़े के अंदर बंदर बैठकर बीड़ी पी रहा है। कल्‍पना किजिए एक बंदर कैसे अंदर पहुंच गया। इसी तरह भोपाल में एक साइकिल रिक्‍शा और मोटरसाइकिल वाले भिड़ गए तो रिक्‍शा वाले ने मोटरसाइकिल वाले को गाली बोली...अभी मेरा लड़ निकालकर फेंकूंगा तो सारे घर वालों को चोदकर यहां वापस आ जाएगा। यह सुनकर मोटरसाइकिल वाला भाग खड़ा हुआ।

आनंद said...

बहुत अव्‍छा प्रयास है, कई साल पहले मैं भी सोचता था कि ऐसे नॉनवेज मुहावरे, जो मौखिक रूप से प्रचलित हैं पर लिखित दिखाई नहीं पड़ते, उनका संकलन करूँगा। अपने इस इरादे का जिक्र करने पर अकसर दोस्‍तों के उपहास का पात्र भी बनता। कुछ तो मेरा आलस्‍य रहा, और कुछ उचित प्रोत्‍साहन नहीं मिला इसलिए यह काम नहीं हो पाया। परंतु अभी भी विश्‍वास है कि जो कल्‍पनाशीलता तथा धार नॉनवेज मुहावरों में है वह अलौकिक ही है। जैसे डरना के लिए प्रचलित मुहावरा है "गाँड़ फटना" या अमुक से तुम्‍हें डर लगता है के बजाए कहें कि अमुक से तुम्‍हारी गाँड़ फटती है तो इसका प्रभाव काफी तेज होगा। इसी तरह ढेर सारी बातें हैं। बहुत अच्‍छा लगा कि आपने ऐसी पहल की। निंदाओं की परवाह न करें। हम पोर्नोग्राफी नहीं कर रहे हैं (हालांक‍ि उसके औचित्‍य पर भी बहस की जा सकती है) बल्कि हमारे देसी भाषाकोष की प्रभावशीलता को Explore करने की कोशिश कर रहे हैं। - आनंद

दिलीप मंडल said...

अरसे से मैं भी इस विषय पर काम करना चाहता था। आपने शुरू किया है। शुभकामनाएं। इस तरह के काम का हिंदी समाज अभ्यस्त नहीं है। इसलिए लोग चौंक रहे हैं। लेकिन चौंकने का काम आम तौर पर अलसाए और ऊंघ रहे लोग करते हैं। इसलिए आपसे निवेदन है कि ऐसे लोगों की बातों का बुरा न मानें और अपने काम में किसी संन्यासी वाले धैर्य के साथ जुटे रहें।

अपनी चपलता और चंचलता के कारण ऐसा धीर-गंभीर काम मुझसे हो नहीं पाता। इसलिए अजित वडनेरकर की सफलता की कामना भी मैं करता रहता हूं। अजित शब्दों का सफर नाम के ब्लॉग में वो काम कर रहे हैं, जो त्रिलोचन करना चाहते थे। लेकिन हिंदी के मठ मालिकों ने उसमें दिलचस्पी नहीं ली (कीड़े पड़ें उन मठ मालिकों को - लीजिए हो गई एक वेज गाली, लेकिन जीतेंद्र जी आप नॉनवेज गालियों को छोड़िएगा नहीं)।

गाली जैसे महत्वपूर्ण विषय पर दरअसल बहुत कम काम हुआ है। मुझे अभी तक सिर्फ एक किताब मिली है (किताबों से मेरा नाता थोड़ा कमजोर सा है) जिसमें इसकी कुछ झलक दिखी थी। किताब का नाम है भोजपुरी लोकोक्ति कोश। इसे बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी ने छापा है। अब शायद उपलब्ध भी नहीं है। ये किताब कई साल पहले किसी पुस्तक मेले या फिर दरियागंज की पुरानी किताबों की मंडी से मुझे मिली थी। उसके कुछ टुकड़े आप आने वाले दिनों में पढ़ेंगे। उस किताब से मुझे पहली बार गालियों के समाजशास्त्र के बारे में जानकारी मिली।

गालियां, किसे, क्यों और क्या लक्ष्य करके दी जाती हैं, इस पर से आप अगर परदा उठा पाते हैं, तो हिंदी और हिंदी समाज के लिए ये आपका अमूल्य और अभिनव योगदान होगा। स्थायी महत्व का काम कर रहे हैं आप।

अजित वडनेरकर said...

वाकई बढ़िया काम कर रहे हैं जीतेंद्र जी। गुजरात के एक सज्जन ने भी इस विषय पर काम शुरू किया था। हमारे परम मित्र और वरिष्ठ पत्रकार डाक्टर हर्षदेव (नवभारत टाइम्स,दिल्ली) भी इस विषय पर विस्तृत शोध में लगे हैं और आगरा, बनारस, दिल्ली की गलियों में खाक छानते फिर रहे हैं। सभी गाली शोधकों को बधाई। लिंग से उपजे कुछ शब्दों के संदर्भ में एक मूल्यवान शोध मेरे हाथ लगा है। बहुसंख्यक गालियों में भी यह शब्द इस्तेमाल होता है। जल्दी ही सफर में आप सब इसे देखेंगे।

dipti said...

बसें हो, ऑटो हो, सड़क हो, रिक्शा हो, मार्केट हो, मोहल्ला हो, दोस्तों का रूम हो या कोई भी जगह हो हर जगह ये अमृतवचन सुन चुकी हूं। कई बार तो मेरे साथी इतने उत्तेजित हो जाते है कि कुछ बहुत ही भौंडा बोलकर कहते है - सॉरी भूल गया था तुम भी बैठी हो। आपका ब्लॉग कुछ अलग है। लेकिन मुझे इस पर अपनी सोच रखने में कुछ हिचकिचाहट हो रही है। शायद ये धीरे धीरे कम हो जाए....

दीप्ति।

दिलीप मंडल said...

दीप्ति की चिंता वाजिब है। ये चिंता हम सबकी होनी चाहिए। संवेदनशील विषय है संवेदनशील ट्रीटमेंट जरूरी है। हम तो नीयत पर संदेह तब तक नहीं करेंगे, जब तक प्रमाण न मिल जाए। और नीयत ही शक के दायरे में आ जाए तो बाय बाय है।

दिलीप मंडल said...

सवाल ये भी है कि आप गाली देनेवाले के पक्ष में हैं या गाली खाने वाले के? संभलकर बंधु। दीप्ति जैसे पाठकों को ध्यान में रखिएगा, गालियों के बारे में लिखते हुए।

surabhi said...

2-3 saal pehle tak mujhe ek bhi standard gaali nahin pata thi. lekin phir mere chote bhai ne mera maargdarshan kiya. uske school mein students khoob gaaliyan jaante hain. vo bata raha tha ki, jab use pehli baar kisi ladke ne gaali di toh vo bada dukhii ho gaya. lekin ab vo aisi situations mein ghabrata nahin hai. usne mujhe bhi ek advice di, ki agar koi ladka tujhe pareshaan kare toh use maadar keh dena, vo tere charno mein aa jaayega. mujhe aaj tak ye samajh nahin aaya ki usne aisa kyun kaha.

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।